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१५ अगस्त

स्वतंत्रता दिवस विशेष – 15 August Special

भारत

15 August के आज की पीढ़ी के लिए क्या मायने है? क्या १५ अगस्त क्या आज भी मन में उतना ही उत्साह और उमंग भरता है जितना कुछ सालो पहले। बहुत से सवाल है 15 August से जुड़े हुए.

इस १५ अगस्त को पीछे मुड़ कर देखते है - क्या खोया क्या पाया

15 August के आज की पीढ़ी के लिए क्या मायने है? क्या १५ अगस्त क्या आज भी मन में उतना ही उत्साह और उमंग भरता है जितना कुछ सालो पहले। बहुत से सवाल है 15 August से जुड़े हुए.

नयी पीढ़ी भारत का इतिहास जान ले तो ये १५ अगस्त पर आलेख सार्थक हो जायेगा.

भारत का प्राचीन प्रवाह

भारत एक विविधता परक राष्ट्र है,जिसमें धर्म,समुदाय, भाषा, जाति,प्रजातीय स्तर पर विविधता उच्चतम स्तर पर पाई जाती है।भारत प्राकृतिक विविधताओं से भी परिपूर्ण है,एक तरफ़ जहां हिमालय है,दूसरी ओर थार के मरुस्थल हैं,वहीं प्रायद्वीपीय क्षेत्र भी पाए जाते हैं, और पठारी क्षेत्र भी।

भारत में एकरूपता नहीं है,लेकिन एकता है,जो विविधता में बसती है,यह निश्चित रूप से विश्व में अनूठा है।भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में 15 अगस्त 1947 को स्थापित हुआ,और संघीय और गणराज्य के तौर पर 26 जनवरी 1950 को।

लेकिन भारत पूर्व में भी अपनी एक साम्राज्य और सभ्यता के तौर पर पूर्व में भी स्थापित था,कहने का अर्थ यह है भारत 15 अगस्त को नहीं बना बल्कि यह एक यात्रा है हज़ारों वर्षों की जो भारत ने ऋषि,मनीषियों,ज्ञानियों, विद्वानों के साथ साहित्य,विज्ञान, कला,योग, वेद, उपनिषद, पुराण के आलोक में तय की है।

भारत में धर्म

भारत आचार्य चाणक्य के अर्थशास्त्र और चन्द्रगुप्त के स्वर्णिम साम्राज्य का साक्षी है।भारत गौतम बुद्ध,महावीर के शांति उपदेशों का प्रवर्तक है,जिसने विश्व में दो मानवतापूर्ण धर्मों को स्थापित किया। विश्व का प्रथम गणराज्य लिच्छवि भारत में सर्वप्रथम स्थापित था।

प्राचीन भारत में ही कई बार आक्रमण हुए,शक, हूण, कुषाण, जैसी कई विदेशी प्रजातियां भारत में समांगी रूप से मिश्रित हुए,और भारतीय कहलाए।

मध्यकाल में भारत पर और आक्रमण हुए,जिसके बाद इस्लाम का आगमन हुआ।जिसमें अकबर अपने समय में दूसरे धर्मों के प्रति भी सम्मान दिखाया,साथ में एक बड़ा राज्य स्थापित किया,बाद में औरंगज़ेब जो धार्मिक तौर पर कट्टर माना जाता है,लेकिन एक विशाल साम्राज्य स्थापित करने में सफल रहा।

औरंगज़ेब के मृत्यु के बाद मुग़ल कमज़ोर हुए,और पतन की ओर उन्मुख हुए, परिणामस्वरूप यूरोपीय कंपनियों का हस्तक्षेप बढ़ा।

मुग़ल काल में भारत व्यापारिक तौर पर समृद्ध था, जिसके कारण भारत में अनेक कंपनियां भारत की ओर व्यापार के लिए आईं।

असल में भारत 15 अगस्त को विदेशी शासन से निकलने में सफल रहा,इस स्वतंत्रता को समझने के लिए जरूरी है,अंग्रेज़ी शासन को जानना।

भारत में अंग्रेज़ी शासन – 15 August flash back

भारत में सर्वप्रथम पुर्तगाली आए,बाद में कई यूरोपीय कंपनियां आईं,जिसमें एक ईस्ट इंडिया कंपनी भी थी।

ईस्ट इंडिया कंपनी ने सर्वप्रथम बंगाल में 1757 में प्लासी का युद्ध लड़ा जिसमें वे विजयी रहे।यह युद्ध कम षड्यंत्र ज्यादा था,बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला के सेनापति,और अधिकारियों को लालच देकर अंग्रेज़ो ने मिला लिया था, फलस्वरूप बंगाल से भारत का शोषण शुरू हुआ।

अंग्रेज़ 1760 के वांडी वाश युद्ध में फ्रांसीसियों को हरा चुके थे,और इसी के साथ यूरोपीय कंपनियों में ईस्ट इंडिया कंपनी विजय हासिल कर चुकी थी।

1765 में मीर कासिम,मुग़ल,और अवध के नवाब ने मिल कर कंपनी से बक्सर में युद्ध किया,जिसमें अंग्रेज़ो ने इस त्रिगुट को हराकर,मुग़ल सम्राट को पेंशनयाफ्ता बना दिया,और अवध को भी आश्रित कर लिया।

और बंगाल में एक दोहरे शासन की स्थापना हुई,जो भारत के प्रत्यक्ष शोषण की शुरुआत हुई।

कालांतर में कंपनी ने मैसूर में हैदर अली और टीपू सुल्तान को हराया।उन्होंने मराठाओं को भी कई युद्धों में हराया,अंततः पेशवा को बिठूर में निष्कासित कर दिया।

धीरे धीरे कंपनी ने 1757 से शुरू होकर 1857 तक में समग्र भारत पर कब्ज़ा कर लिया था।

कंपनी का शासन प्रणाली औपनिवेशिक रहा,जिसमें शुरू में किसानो पर कई तरीके के कर थोपे गए।और हस्तशिल्प कारीगर,दस्तकारों का शोषण लगातार हुआ।बाद में भारत से कच्चे माल को ब्रिटेन हस्तांतरित करना और वहां से सस्ता औद्योगिक उत्पाद लाकर भारत में बेचने से भारतीय अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से पंगु बना दिया गया।

डलहौजी के शासन काल में भारत में सड़क,रेल,पुल, डाक, तार आदि का विकास हुआ,जो भारत के शोषण में सहायक ही सिद्ध हुए।

19 वीं सदी के पूर्वार्द्ध में कई समाज और धर्म सुधार हुए,जिसमें सती प्रथा उन्मूलन,और विधवा विवाह जैसे विषयों पर कानून बने।इस समाज सुधार आंदोलन में राजा राम मोहन राय,दयानंद सरस्वती,सैयद अहमद,ज्योतिबा फुले जैसे समाज सुधारकों का उदय हुआ।

1857की क्रांति – 15 August real beginning

15 august par lekh
भारत में 19 वीं सदी के पूर्वार्द्ध में कई विद्रोह हुए,जो सम्मिलित रूप से 57 में बड़े विद्रोह के रूप में उभरे। बैरकपुर से मंगल पांडे ने इसकी शुरुआत की,जो अलग अलग जगहों पर अलग अलग योद्धाओं द्वारा लड़ा गया।कानपुर में पेशवा,झांसी में लक्ष्मी बाई,लखनऊ में बेगम हज़रत महल,बिहार में बाबू कुंवर सिंह, ग्वालियर में तात्या टोपे जैसे योद्धाओं ने ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंकने की कोशिश की,लेकिन वे असफल रहे।

इसके कई कारण थे,यह विद्रोह सैन्य विद्रोह था,हालांकि किसान शामिल हुए,लेकिन जमींदार,और पढ़ा लिखा वर्ग साथ में कई राजघराने अंग्रेज़ों के पक्ष में रहे।फलस्वरूप यह असफल रहा,लेकिन फिर भी यह भारत की जनता को जगाने में सफल रहा था।

भारत का स्वातंत्र्य संग्राम

19 वीं सदी के उत्तरार्ध में कई क्षेत्रीय संगठन बन कर आए,जो बाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के रूप में पहली बार अखिल भारतीय स्तर पर एक बड़े संगठन के रूप में उभरा,जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के धुरी के रूप में कार्य किया। शुरुआत में कांग्रेस एक ऐसे संगठन के रूप में रही जो पढ़े लिखे लोगों का था,और ये लोग ब्रिटिश नीतियों की समालोचना करते थे,लेकिन इनका मानना था कि ब्रिटिश शासन में ही भारत विकसित हो सकता है।

इसमें मुख्य नाम थे दादा भाई नौरोजी,सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, फिरोज़ शाह मेहता,बदरुद्दीन तैयब जैसे नेता थे।

19 वीं सदी के अंतिम दशक से कांग्रेस में ही एक दूसरे वर्ग का जन्म हुआ, जिसे उग्रवादी या गरमपंथी कहा गया,जिसमें लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, विपिन चन्द्र पाल जैसे नाम मशहूर हुए।

इस समय जब ब्रिटिश सरकार अपने कठोर कानून के माध्यम से राष्ट्रवाद को दबाने की कोशिश कर रही थी,तब गरमपंथी वर्ग मांग,और पत्रों से ऊपर उठकर विरोध करना चाह रहा था।

1905 में बंगाल विभाजन कर दिया गया,जिसके परिणाम स्वरूप एक नया आंदोलन शुरू हुआ,जिसे स्वदेशी कहा गया,इसमें ब्रिटिश वस्तुओं एवम् सेवाओं के बहिष्कार की शुरुआत हुई,इसी बीच 1906 में सांप्रदायिक पक्ष को बढ़ाते हुए अंग्रेजों के समर्थन से मुस्लिम लीग नामक दल का गठन हुआ,जो बाद में भारत विभाजन का कारण बनी।

और 1907 में कांग्रेस दो गुटों में विभाजित हो चुकी थी।एक नरमपंथी दूसरा गरमपंथी और यह आंदोलन दबाया जा चुका था।

भारत में खुदी राम बोस,वीर सावरकर जैसे क्रांतिकारियों का उदय हो चुका था।

बाद में 1916 में होमरुल की शुरुआत हुई,लेकिन यह भी दबा दिया गया।

इसी बीच गांधी का आगमन हुआ,जिन्होंने अफ्रीका में कई आंदोलन चलाए थे,गांधी ने 1917 में चंपारण में नील किसानों के लिए सत्याग्रह किया।

सत्याग्रह भारत की राजनीति में नया सिद्धांत था,जो बहुत हद तक सफल हुआ।1918 में अहमदाबाद में मिल मजदूरों के लिए,और 1919 में खेड़ा में किसानों के लिए सत्याग्रह किया।

विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद रौलेट एक्ट आया,जो राजनीतिक दबाव के लिए लाया गया था,जवाब में गांधी जी ने रौलट सत्याग्रह शुरू किया,जिसका अंत जलियावाला में हज़ारों लोगों पर नृशंस गोलीबारी के बाद हुआ।

1920 में भारत में ख़िलाफत शुरू हुआ,ख़िलाफत तुर्की में खलीफा के पद को पुनर्स्थापित करने के लिए शुरू हुआ था, जिसे गांधी जी ने असहयोग आंदोलन के साथ जोड़कर एक बड़ा आंदोलन चलाया।

इसमें किसान, मजदूर, छात्र,महिलाओं, युवाओं की भागीदारी थी।चौरी चौरा में हिंसा के बाद गांधी जी ने उसे वापस ले लिया।

गांधी जी जेल में भी रहे,और रूसी क्रांति से प्रभावित होकर भारत में समाजवादी विचारधारा का आगमन हुआ।नेहरू, बोस जैसे नए नेताओं का उदय हुआ।

इसी बीच साइमन कमीशन भारत आया,जिसका कांग्रेस समेत सभी दलों ने विरोध किया।

गांधी जी ने 1930 में दांडी यात्रा के साथ सविनय अवज्ञा की शुरुआत की,जो द्वितीय गोलमेज सम्मेलन,1931 तक चला।गांधी जी ने लौटने के बाद दुबारा इसे चलाया,लेकिन यह उतना सफल नहीं हुआ।और 1934 में वापस ले लिया गया,इसमें वयस्क मताधिकार जैसी मांगे शामिल थीं।

फिर द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटेन का नाज़ी जर्मनी के विरुद्ध साथ देने के एवज में भारत ने अपनी स्वतंत्रता मांगी,जिसके लिए गांधी जी ने भारत छोड़ो आंदोलन भी चलाया।लेकिन यह बहुत तेजी से दबा दिया गया।

विश्व युद्ध खत्म होने के साथ अमेरिका जैसे देशों का ब्रिटेन पर भारत की आजादी के लिए दबाव बढ़ चुका था,साथ में ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार आ चुकी थी.

और भारत में कैबिनेट मिशन भेजा गया,जो हद तक सफल नहीं हुआ,और मार्च 1947में लॉर्ड लुई माउंटबेटन भारत आ चुके थे,जिसके बाद मुस्लिम लीग के मांग अनुसार ब्रिटिश भारत और रजवाड़ों में से दो राष्ट्र बन कर निकले,भारत और पाकिस्तान।

भारत में पंडित जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन हुआ,और 2 साल 11 महीने,18 दिन में भारत का संविधान बन कर तैयार हुआ।

संवैधानिक विकास

भारत का

भारत में आधुनिक संवैधानिक विकास में अंग्रेज़ों का योगदान महत्वपूर्ण है।1773,1784,1813,1833,1853, 1858,1861,1892 में पारित विभिन्न चार्टर,भारत अधिनियमों ने भारत में आधुनिक शासन का एक ढांचा तैयार किया।जिसमें सभी के लिए समान कानून का शासन,जैसी बातें थीं।

भारत में गवर्नर,गवर्नर जनरल से होते हुए वायसराय हो चुकी था।सुप्रीम कोर्ट की स्थापना न्याय प्रणाली के लिए बदलाव की शुरुआत थी।

1853 से सिविल सेवा परीक्षा सभी के लिए खोल दी गई।

1858 के अधिनियम में वायसराय को अध्यादेश जारी करने की शक्ति थी।<

1909 में पारित मोर्ले मिंटो सुधार को साम्प्रदायिकता का जनक कहा जाता है,जिसमें सांप्रदायिक निर्वाचन स्वीकार किया गया।1919 में सिक्खों को भी अलग निर्वाचन दिया गया।

1935 के भारत शासन अधिनियम को भारतीय संविधान का आधार माना जाता है।

भारत में संविधानिक विकास के लिए एक संविधान सभा बनाई गई,जिसके पूर्णकालिक अध्यक्ष बाबू राजेन्द्र प्रसाद बनाए गए, और प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ भीम राव अंबेडकर बनाए गए,जिन्हें भारतीय संविधान का निर्माता भी कहा जाता है।

भारतीय संविधान का स्वरूप संघीय और एकात्मक दोनों के गुणों के बीच में कहीं है।पहली अनुसूची के अनुसार भारत का राज्यों का संघ है,अर्थात इसमें मुख्यतः केंद्र और राज्य स्तर पर सरकारें है,जिनके अलग अलग कार्य हैं,जो विभाजित भी हैं।

भारतीय संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है,इसमें पंथनिरपेक्ष,समानता,जैसे गुण शामिल हैं।

भारत:आज

What are we on this 15 August?

भारत का लोकतंत्र

आज भारत की आजादी के 73 साल हो गए हैं,तब हम भारतीयों को अपने इतिहास का अवलोकन करना चाहिए,क्योंकि जो राष्ट्र अपने इतिहास से नहीं सीख लेता,उसका पतन निश्चित है।

आज जब चीन जैसा साम्राज्यवादी देश जब भारत की सीमा पर नजर डाल रहा है,तब प्लासी,बक्सर,साथ में 1962 में हुई गलतियों को दोहराने से बचना होगा।

जब देश में साम्प्रदायिकता किसी न किसी स्तर पर बढ़ रही है,और संसाधनों का अति दोहन हो रहा है,जिससे प्रदूषण बढ़ रहा है।साथ में बढ़ रही है आबादी जिससे गरीबी, समुचित शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा की कमी हो रही है,तब हम गांधी जी के विचारों को समाज में दुबारा से बढ़ाए जाने की जरूरत है।

आज कोरोना काल में जब बड़े औद्योगिक घराने बंद हुए तब आत्मनिर्भर भारत की शुरुआत भारत के प्रधानमंत्री ने की,लेकिन यही आत्मनिर्भरता और कुटीर उद्योग का सिद्धांत महात्मा गांधी के विचारों का अंग था।

आज जब भारत में नई शिक्षा नीति  आई है,तब मैकाले  के शिक्षा नीति के दुर्गुणों की चर्चा होनी चाहिए,और उससे यह सीखा जाना चाहिए कि शिक्षा नीति का स्वरूप क्या होना चाहिए।

भारत को अभी कोरोना जैसी बीमारी से,जलवायु परिवर्तन से,गरीबी से,बेरोजगारी से एक बड़ी जनसंख्या को निकालना है। न सिर्फ़ भारत को भविष्य में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं से सम्पन्न करना है,जिससे भारत एक बड़ी आर्थिक,विकसित शक्ति के रूप में उभरे।<

भारत के पास उपलब्ध युवा शक्ति उसकी ताकत है,जिसको मजबूत करके भारत आने वाले समय में महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर हो सकता है।

भारत की आजादी आर्थिक,सामाजिक,वैयक्तिक होनी चाहिए,जो सभी को एक गरिमामय जीवन उपलब्ध कराए,जिस दिशा में हमें कार्य करना होगा।

ऐसा ही संविधान के अनुच्छेद 44 में वर्णित समान नागरिक संहिता की ओर भी हमें बढ़ना होगा।

समूचा विश्व आने वाली तकनीकी क्रांति के मुहाने पर खड़ा है, भारत को इसके युवाओं को इसके लिए तैयार रखना होगा,जिससे भारत के लिए यह तकनीक आगे ले जाने में सार्थक सिद्ध हो।

भारत का इसरो अंतरिक्ष में रोज नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है।मंगल यान और चन्द्र यान(जो90 फीसद ही सफल रहा था) भारत की अंतरिक्ष में हुंकार हैं,भारत अब गगन यान की ओर देख कर रहा है।

भारत संभावनाओं का देश है,भारत में इंटरनेट की सुलभता बढ़ी है,भारत में सभी घरों में शौचालय जैसी मूलभूत सुविधा उपलब्ध नहीं थी,लेकिन उस हासिल किया गया,जो अपने आप में एक महत्वपूर्ण और स्वास्थ्यप्रद विषय है।

भारत पोलियोमुक्त हुआ,यह भारत की जीत है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन को साकार करने में लगा है,जो वैश्विक स्तर पर भारत की भूमिका को महत्वपूर्ण बनाता है।भारत ने अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस की शुरुआत कराई,जिसने भारत की प्राचीन परंपरा को विश्व में स्थान दिलाया।

भारत एक बड़े बाजार के रूप में देखा जाता रहा है,उम्मीद है भारत अब उत्पादक बनने की अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने में सफल साबित होगा।और इस आपदा काल से बाहर निकल कर अपने को विश्व में स्थापित करने में सफल होगा।

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