सेहत समाचार

जानकारिया

गायत्री मंत्र का अर्थ – Meaning of Gayatri Mantra Explained in Hindi

real god

गायत्री मंत्र का अर्थ (Gayatri mantra meaning) बहुत गूढ़ है. इसमें ऊर्जा है, सत्य है, भौतिक और आध्यत्मिक से परे शक्ति का समायोजन है और इसमें है जीवन।

गायत्री मंत्र का अर्थ (Gayatri mantra meaning) बहुत गूढ़ है. इसमें ऊर्जा है, सत्य है, भौतिक और आध्यत्मिक से परे शक्ति का समायोजन है और इसमें है जीवन।

इस लेख में जानकारिया

गायत्री मंत्र का अर्थ (Gayatri mantra meaning) बहुत गूढ़ है. इसमें ऊर्जा है, सत्य है, भौतिक और आध्यत्मिक से परे शक्ति का समायोजन है और इसमें है जीवन। ब्रह्म ज्ञान बहुत ही कम लोगो को प्राप्त होता है. वो भी कठोर तपस्या करने के बाद. पर अगर गायत्री मंत्र का अर्थ समझ लिया तो वो ब्रह्म ज्ञान स्वभावी रूप से आपको मिलेगा.

गायत्री मन्त्र – इतिहास

earth

पृथ्वी के निर्माण के बाद वर्तमान तक हजारों धर्म अस्तित्व में आए।

परंतु आज के दौर में लगभग 300 धर्मो का अस्तित्व है जिनमें भी केवल 7 धर्म सनातन ,ईसाई, सिख,यहूदी, जैन,पारसी बौद्ध मुख्य रूप से प्रचलित हैं।

इनके अलावा धर्मो को मानने वालो की संख्या बहुत ही नाम मात्र की है ।

अब मुख्य सवाल ये है कि हजार धर्मो में से तीन सौ धर्मो का बचना आखिर 700 धर्म कहा विलुप्त हो गए।

तो 700 धर्मो का विलुप्त होना कोई अचानक होने वाली प्रक्रिया नही हैं इनमें से कुछ धर्म अन्य धर्मो के कट्टरता के शिकार हो गए एवं कुछ धर्मो का विस्तार ही नहीं हो सका उदहारण के तौर पे अकबर का दिन ए इलाही।

चुकी ये लेख सनातन धर्म के लिए अतः में अन्य धर्मो की और नही जाऊंगा एवं अब वापस सनातन धर्म की और आता हूं।
आखिर इतने धर्मो के पतन के बाद क्या सनातन धर्म का पतन हो सकता हैं?

क्या सनातन धर्म कट्टरता का शिकार हो सकता है?

hopeless kattar

तो इस सवाल का जवाब आपको सनातन के उदय से मिलेगा ।

कहा जाता है सनातन धर्म पृथ्वी पे उस दिन से है जिस दिन इस पृथ्वी पे पहला कदम किसी इंसान ने रखा और वो इंसान और कोई नही बल्कि स्वयं भगवान ब्रह्मा द्वारा बनाए ‘ मनु’ थे।

अर्थात् सनातन धर्म पृथ्वी के निर्माण के साथ आरंभ हुआ है और सनातन धर्म के अंत भी पृथ्वी के अंत के साथ होगा।
वैसे तो हमरा धर्म अति विशिष्ठ है जिसके हजारों कारण है

उनमें से एक कारण है हमारे धर्मो में पाए जाने वाले वेद और उन वेदों में पाए जाने वाले अति शक्तिशाली मंत्रो का समूह।
उन मंत्रो में से एक बहुत ही शक्तिशाली मंत्र हैं ‘ गायत्री मंत्र ‘ जिसे प्राण मंत्र भी कहा जाता है एवं इस मंत्र के उच्चारण मात्र से ही ईश्वर की प्राप्ति होती है, ईश्वर हमारी रक्षा को सदैव तत्पर रहते हैं।

गायत्री मन्त्र की रचना

एक कथा के अनुसार गायत्री मंत्र की रचना विश्वामित्र जी ने तब किया जब वो माया में पड़ कर अपनी तपस्या पूर्ण नहीं कर पा रहे थे।

तो वो शक्तिशाली मंत्र इस प्रकार हैं –

‘ ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो न: प्रचोदयात् ‘

Om bhoor bhuvah svah
Tatsvitur vareniyam
bhargo devasya dheemahi
dhiyo yo nah prachodayaat.

गायत्री मंत्र का अर्थ –

ॐ का अर्थ

—–सर्व रक्षक परमात्मा

ॐ तीन शब्दों अ ,उ ,म् के मेल से बना हैं ये तीन शब्द ब्रह्म विष्णु एवं महेश के प्रतीक हैं।

ॐ को हम गायत्री मंत्र के पहले लगाते हैं।

भूर्भुव: का अर्थ

2 शब्दों भू:+भुवः के मेल से बना है जिसका अर्थ मनुष्यों को प्राण देने वाला एवं उनके दुःख का विनाश करने वाला एवम् मनुष्यों में चेतना का रूप होता हैं।

यह गायत्री मंत्र का बीज मंत्र हैं।

बीज मंत्र वह मंत्र होता है जो हमारी साधना को सिद्धि दिलाती हैं।

स्वः का अर्थ

का अर्थ सुख प्रदान करने वाला के रूप में जाना जाता हैं।

तत्सवीतुर्वरेण्यम यह 3 शब्दों के मेल से बना हैं तत्+सवितुः+वरेण्यम जिसका अर्थ वह सूर्य की भांति उज्जवल एवं सर्वोत्तम एवम् सम्पूर्ण ब्रह्मांड को सभी वस्तुओं को प्रदान करने वाला होता हैं।

भर्गो का अर्थ

कर्मो का उद्धार करने वाले

देवस्य का अर्थ

ईश्वर के

धीमही का अर्थ

हम ध्यान करे

धियो का अर्थ

बुद्धियों का

यो का अर्थ

जो

न: का अर्थ

प्राथना केवल अपने लिए नहीं वरन् सभी के लिए

प्रचोदयात्य का अर्थ

ह गायत्री मंत्र का आखिरी शब्द जिसका अर्थ हम अपने मार्गदर्शन कि प्रार्थना करते हुए कहते ही कि है ईश्वर हमें शुभ कार्यों की ओर अग्रसर करे।

गायत्री मन्त्र का भावार्थ

उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तःकरण में धारण करें । वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।

गायत्री मंत्र प्राण मंत्र हैं मंत्र का अर्थ होता हैं किसी के नाम का मनन करना यह मंत्र सूर्य देवता के स्त्री रूप सावित्री का मनन है जो हमें इन्द्रियों से मुक्ति दिलाती हैं।

गायत्री मंत्र में 24 शब्द हैं जो चौबीस अवतार ,चौबीस शक्तियां जैसे सफलता ,पराक्रम,योग ,पालन ,साहस इत्यादि है अर्थात् गायत्री मंत्र के उच्चारण से हमें ये शक्तियां मिलती हैं।

कितने गायत्री मंत्र है ? (गायत्री मन्त्र के प्रकार )

real god

गायत्री मंत्रो की संख्या

उपनिषदों में कुल 34 गायत्री मंत्र हैं जिनका पूर्ण विवरण नारायण उपनिषद में मिलती हैं।
जैसे शनि देव के लिए गायत्री मंत्र इस प्रकार हैं

शनि महाराज का गायत्री मन्त्र

– ऊँ भगभवाय विद्महैं मृत्युरुपाय धीमहि तन्नो शनिः प्रचोद्यात्। ऊँ श्रां श्रीं श्रूं शनैश्चाराय नमः।
ठीक इसी प्रकार ब्रह्मा विष्णु महेश गणेश काली माता नृसिंह आदि देवो के लिए भी गायत्री मंत्र हैं।
जो इस प्रकार से हैं –

भगवान गणेश जी के लिए 2 गायत्री मंत्र अर्पित किए गए हैं
ॐ एकदन्ताय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ।।

एवम्

ॐ तत्पुरुषाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ।

भगवान् राम का गायत्री मन्त्र

ठीक इसी प्रकार भगवान राम के लिए

ऊँ दशरथये विद्महे सीतावल्लभाय धीमहि, तन्नो राम: प्रचोदयात्।

लक्ष्मणजी का गायत्री मन्त्र

भगवान राम के छोटे भाई जो लक्षण श्री हरी के वाहन शेष नाग के मनुष्य अवतार हैं उनके लिए

ऊँ दशरथये विद्महे अलबेलाय धीमहि तन्नो लक्ष्मण प्रचोदयात्।

माता सीताजी का गायत्री मन्त्र

माता सीता के गायत्री मंत्र का उल्लेख इस से प्रकार हैं

ऊँ जनकाय विद्महे राम प्रियाय धीमहि, तन्नो सीता प्रचोदयात्।

हनुमानजी का गायत्री मन्त्र

भगवान शिव के अंश एवम् भगवान श्री हरि के मानव अवतार भगवान राम के प्रिय भक्त पवन पुत्र हनुमान जी के लिए गायत्री मंत्र इस प्रकार हैं

ऊँ अंजनीजाय विद्महे वायुपुत्राय धीमहि तन्नो हनुमान् प्रचोदयात्।

एवम्

ॐ वायुपुत्राय विद्महे, रामदूताय धीमहि, तन्नो हनुमत् प्रचोदयात् ।

श्री हरिजी का गायत्री मन्त्र

श्री हरि के कृष्ण अवतार जो 64 गुणों संपन्न हैं साथ ही साथ पूरे ब्रह्मांड के पालनहार हैं उनके चरण कमलों में समर्पित गायत्री मंत्र हैं

ऊँ देवकी नन्दनाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि, तन्नो कृष्ण: प्रचोदयात्।

श्री राधा के गायत्री मंत्र हैं –

ऊँ वशभानुजायै विद्महे कृष्णप्रियायै धीमहि, तन्नो राधिका प्रचोदयात्।

ब्रह्माजी का गायत्री मन्त्र

सृष्टि के निर्माता भगवान ब्रह्मा के लिए तीन गायत्री मंत्रो का उल्लेख मिलता हैं जो इस प्रकार हैं

ॐ परमेश्वर्याय विद्महे, परतत्वाय धीमहि, तन्नो ब्रह्म प्रचोदयात् ।

ॐ वेदात्मने विद्महे, हिरण्यगर्भाय धीमहि, तन्नो ब्रह्म प्रचोदयात् ।

एवम्

ॐ चतुर्मुखाय विद्महे, कमण्डलु धाराय धीमहि, तन्नो ब्रह्म प्रचोदयात् ।

विष्णुजी का गायत्री मंत्र

इस सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु के लिए उल्लेखित गायत्री मंत्र हैं

ॐ नारायणाय विद्महे, वासुदेवाय धीमहि, तन्नो विष्णु प्रचोदयात्

गरुड़जी के लिए गायत्री मन्त्र

आप ऋषि कश्यप से तो भाली भाती परिचित होंगे ना तो ऋषि कश्यप को विनीता नाम की कन्या से 2 पुत्र उत्पन्न हुए एक अरुण जो भगवान सूर्य के सारथी बने ( रामायण काल में आपने जटायु का नाम तो सुना होगा ना वो जटायु अरुण जी के ही पुत्र थे)
दूसरे हुए गरुड़ जो भगवान विष्णु के वाहन बने ।

अब आप सोच सकते है हमारे धर्म की महानता की हमारे धर्म में किसी को ना छोटा समझा जाता है ना बड़ा
किसी को उंच समझा जाता है ना नीच उसी का एक उदाहरण है कि भगवान विष्णु की सेवा में अपने जीवन को समर्पित करने वाले भगवान् गरुड़ के लिए एक गायत्री मंत्र का होना

आप उनके लिए गायत्री मंत्र को देखे

ॐ तत्पुरूषाय विद्महे, सुवर्णपक्षाय धीमहि, तन्नो गरुड: प्रचोदयात् ।

भगवान् शिव के गायत्री मन्त्र

स सृष्टि के विलयकर्ता देवो के देव महादेव जिन्हें वेद में रुद्र के नाम से जाना जाता हैं उनके लिए दो गायत्री मंत्र हैं जो इस प्रकार हैं

ॐ पंचवक्त्राय विद्महे, सहस्राक्षाय महादेवाय धीमहि, तन्नो रुद्र प्रचोदयात्।

एवम्

ॐ तत्पुरुषाय विद्महे, महादेवाय धीमहि, तन्नो रुद्र: प्रचोदयात्।

भगवान् महादेव के ही एक रूप का वर्णन दक्षिणामूर्ति के रूप में किया गया हैं जिनके लिए गायत्री मंत्र हैं

ॐ दक्षिणामूर्तये विद्महे, ध्यानस्थाय धीमहि, तन्नो धीश: प्रचोदयात् ।

भगवान् शिव के लिए एक अन्य नाम हैं नन्दिकेश्वरा जिनके लिए गायत्री मंत्र हैं

ॐ तत्पुरुषाय विद्महे, नन्दिकेश्वराय धीमहि, तन्नो वृषभ: प्रचोदयात् ।।

धन्वन्तरिजी के लिए गायत्री मन्त्र

एक महान चिकिस्तक जिन्हें सनातन धर्म के अनुसार भगवान विष्णु के ही एक अवतार मना जाता हैं जिनका अवतरण समुद्र मंथन के द्वारा हुआ धनवंतरी जी के अवतरण के अवसर पर दीपावली के 2 दिन पूर्व धनतेरस मनाया जाता हैं।

आयुर्वेदाचार्य धनवन्तरी जी के लिए गायत्री मंत्र हैं

ॐ अमुद हस्ताय विद्महे, आरोग्य अनुग्रहाय धीमहि, तन्नो धनवन्त्री प्रचोदयात् ।

सनातन धर्म की एक विशेषता हैं की देवियों को देवो के समतुल्य महत्व दिया गया हैं और ये विशेषता केवल सनातन धर्म में ही विशेष रूप से पाई जाती हैं अतः वेदों में देवियों के लिए भी गायत्री मंत्र की रचना मिलती हैं जो इस प्रकार हैं।

मां दुर्गा के लिए तीन गायत्री मंत्र

मां दुर्गा के लिए तीन गायत्री मंत्रो का उल्लेख हैं जो इस प्रकार हैं

ॐ कात्यायन्यै विद्महे, कन्याकुमार्ये च धीमहि, तन्नो दुर्गा प्रचोदयात् ।

ॐ गिरिजाय च विद्महे, शिवप्रियाय च धीमहि, तन्नो दुर्गा प्रचोदयात् ।

एवम्

ॐ महाशूलिन्यै विद्महे, महादुर्गायै धीमहि, तन्नो भगवती प्रचोदयात् ।

माँ सरस्वती के लिए गायत्री मन्त्र

विद्या की देवी मां सरस्वती के लिए गायत्री मंत्र जो छात्रों के बौद्धिक क्षमता ,निर्णय क्षमता बढ़ाने में सहायक सिद्ध होने वाला हैं वो इस प्रकार हैं

ॐ वाग्देव्यै च विद्महे, कामराजाय धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात् ।

माँ काली के लिए गायत्री मन्त्र

दुष्टों का नाश करने वाली , पुण्यात्माओं की रक्षा करने वाली खप्पर वाली मां काली के लिए अर्पित गायत्री मंत्र हैं

ॐ कालिकायै च विद्महे, श्मशानवासिन्यै धीमहि, तन्नो घोरा प्रचोदयात्

लक्ष्मीजी के लिए गायत्री मन्त्र

विष्णु की आर्धांगीनी माता लक्ष्मी के लिए गायत्री मंत्र

ॐ महादेव्यै च विद्महे, विष्णुपत्न्यै च धीमहि, तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ।

तुलसी जी के लिए गायत्री मन्त्र

भगवान विष्णु की प्रिय तुलसी जी के लिए गायत्री मंत्र हैं

ॐ तुलसीदेव्यै च विद्महे, विष्णुप्रियायै च धीमहि, तन्नो वृन्दा प्रचोदयात् ।

शक्ति को अर्पित गायत्री मंत्र हैं

ॐ सर्वसंमोहिन्यै विद्महे, विश्वजनन्यै धीमहि, तन्नो शक्ति प्रचोदयात् ।

अन्नपूर्णाजी के लिए गायत्री मन्त्र

संसार का भरण पोषण करने वाली मां जगदम्बा के ही रूप अन्नपूर्णा देवी के लिए गायत्री मंत्र हैं

ॐ भगवत्यै च विद्महे, महेश्वर्यै च धीमहि, तन्नोन्नपूर्णा प्रचोदयात् ।

इनके अलावा कुछ और गायत्री मंत्र पे नजर डाले तो

कार्तिकेय के लिए गायत्री मन्त्र | अय्यप्पा जी के लिए गायत्री मन्त्र

देवो के देव महादेव के एक पुत्र अयप्पन देव के लिए गायत्री मंत्र हैं

ॐ भूतादिपाय विद्महे, महादेवाय धीमहि, तन्नो शास्ता प्रचोदयात् ।

शण्मुखजी के लिए गायत्री मन्त्र

शण्मुख जो कलियुग के देवता हैं साथ ही साथ भगवान शंकर के पुत्र हैं उनके लिए गायत्री मंत्र का उल्लेख इस प्रकार हैं।

ॐ तत्पुरुषाय विद्महे, महासेनाय धीमहि, तन्नो शण्मुख प्रचोदयात् ।

गायत्री मन्त्र से जुडी प्रचलित कहानिया

ganeshji gaytri mantra

गायत्री मन्त्र का अर्थ बहुत महत्वपूर्ण होता है. सही उच्चारण के बिना इसका उद्देश्य पूरा नहीं होता और न ही लाभ.

चलिए एक रोमांचक कहानी सुनाता हूं कि हयग्रीव का बध हयग्रीव के हाथों हुआ ।अरे चौक गए ना आप की मैंने गलत लिख दिया या आपने गलत पढ़ लिए।

लेकिन मैं कहूं की ना आपने गलत पढ़ा ना मैंने गलत लिखा तो फिर से चौक जायेंगे कि की हयग्रीव ने हयग्रीव का बध कैसे किया क्या कोई खुद का बध कर सकता हैं या फिर हयग्रीव ने आत्म हत्या किया!

तो आइए थोड़ा स्पष्ट करता हूं और इस राज से पर्दा उठाने की कोशिश करता हूं।

एक समय की बात हैं एक हयग्रीव नमक दानव का जन्म हुआ जिसका सिर घोड़े का था ।

वो आदिशक्ति की उपासना करके दानवों को परंपरा निभाते हुए अमरता का वरदान मांगा।( दानव अधिकतर अमरता का ही वरदान मांगा करते थे।)

जिसे आदिशक्ति ने इनकार करते हुए देवताओं की परंपरा का निर्वहन किया।

अमरता का वरदान ना मिलने पर हयग्रीव ने कहा ठीक हैं परंतु मेरी मृत्यु हयग्रीव के हाथों हों।
देवी तथास्तु कहकर अन्तर्ध्यान हो गई।

इसी दानव का बध करने हेतु भगवान विष्णु हयग्रीव का रूप धारण कर अवतार किए और उस दानव का बध किए ।
भगवान विष्णु के इस हयग्रीव अवतार के लिए गायत्री मंत्र हैं

ॐ वागीश्वराय विद्महे, हयग्रीवाय धीमहि, तन्नो हंस: प्रचोदयात् ।।

गायत्री मन्त्र के  रूप एवम् वर्ण

 

गायत्री मंत्र का रूप एवम् वर्ण समय के साथ बदलते रहते हैं प्रातः काल में यह छोटी कन्या के रूप में लाल रंग धारण किए हुए विराजमान होती हैं।

मध्याह्न में यह सुंदर स्त्री के रूप में पीला वर्ण लिए विराजमान होती हैं।

रात्रि के समय ज्ञान से भरपूर वृद्ध एवम् घूसर वर्ण के साथ विराजमान होती हैं।

सभी वर्ण एवम् रूप मानव के चेतना जागृत करने वाले हैं। जिस प्रकार प्रकाश धारण किए हुए वस्तुओं के समक्ष अंधेरा फटकती भी नहीं उसी प्रकार गायत्री मंत्र धारण किए हुए व्यक्ति के पास अज्ञानता रूपी अंधकार नहीं फटकती।

गायत्री मंत्र उच्चारण विधि

 

इन मंत्रो का उच्चारण ब्रह्ममुहुर्त में किया जा सकता हैं। अगर गलत उच्चारण करेंगे तो गायत्री मंत्र का अर्थ का अनर्थ हो जायेगा।

आप इन मंत्रो को सूर्य उदय के 2 घंटे पूर्व से लेकर सूर्य अस्थ के 1घंटे बाद तक कर सकते हैं।

कुछ लोगों का मानना हैं की गायत्री मंत्रो का उच्चारण रात में करना वर्जित हैं।

हम इन मंत्रो को स्फटिक( 108 सफेद मोतियों की माला) अथवा रुद्राक्ष पे भी ऊंचे स्वर में कर सकते।

क्योंकी हमारे धर्म की मान्यता है कि निम्न स्वर में निम्न फल एवम् ऊंचे स्वर में अच्छे फल की प्राप्ति होती हैं।

अगर समय का अभाव हो तो हम सूर्य देवता को जल अर्पित करते समय 3 बार गायत्री मंत्र का उच्चारण कर सकते हैं।

अर्थात् नियमित गायत्री मंत्र के जाप से चेतना जागृत होती हैं और कुशाग्र बुद्धि विकसित होने के साथ साथ हमें पापों से मुक्ति मिलती है और हमारे लिए बैकुंठ धाम का मार्ग प्रशस्त होता हैं।

बहुत सी सेहत और ज्ञान सम्बंधित बातो को जानने समझने के लिए पढ़िए सेहत समाचार

1 Comment

1 Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

To Top